...सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना....
-अवतार सिंह संधू उर्फ़ पाश

Thursday, December 3, 2009

टीवी धारावाहिकों के जरिए व्यवस्था परिवर्तन की बयार


दो-तीन साल पहले तक जब टेलीविजन चैनलों पर सास-बहू के शातिराना झगड़े, घरेलू रंजिशों की दास्तां पेश करने वाले धारावाहिकों का दौर चल रहा था तो मैं यही सोचा करता था कि ये टीवी चैनल लोगों के सामने क्या परोस रहे हैं? इनसे हमारे समाज, उसके लोगों की सोच, उनके जीवन में कितना सुधार आ सकता है? हर बार मुझे जवाब ‘ना’ में ज्यादा सुनाई पड़ते। मैं तब और हताश हो उठता जब उन धारावाहिकों के घरेलू उठा-पटक को पड़ोस और परिचितों के घरों में घटते देखता था। यह दौर था ‘बालाजी टीलीफिल्म’ का जिसके धारावाहिकों में कहानी के विषय-वस्तु की बजाए शानदार सेट और पात्रों के लकदक कॉस्ट्यूम के तिलस्म दर्शकों को खूब लुभाते थे।

पर पिछ्ले 2-3 सालों से मेरी यह धारणा टूटने लगी है। इन वर्षों में टीवी धारावाहिकों के कंटेंट और विषय में बड़े बदलाव आए। वर्ष 2008 के मध्य में ‘कलर्स’ टीवी चैनल ने जहां बिल्कुल नए और रोचक विषयों को लेकर अपने कई शो पेश किए तो ‘सब टीवी’ और ‘ज़ी’ जैसे अन्य चैनलों पर भी कई सारे नए धारावाहिक दिखाई पड़े, जिन्होंने दर्शकों को सास-बहू के साजिशों की दमघोंटू चहारदीवारी से बाहर निकाल कर एक नई वैचारिक भूमि दी। इनकी कहानियां घर से बाहर निकल कर किसी न किसी समाज की सच्चाइयों पर सजी हैं। इन कहानियों ने दर्शकों को उनके देश के असली समाज और उसके सरोकारों से जोड़ना शुरु किया। ‘अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो’ (ज़ी टीवी), ‘बालिका वधू’ (कलर्स), ‘इन देस न आना लाडो’ (कलर्स), ‘पवित्र रिश्ता’ (ज़ी टीवी), लापतागंज (सब टीवी), 12/24 ‘करोल बाग’ (ज़ी टीवी), ‘आपकी अंतरा’ (ज़ी टीवी) ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ (सब टीवी), जैसे कई धारावाहिक ऐसे हैं जो मध्यम वर्गीय दर्शकों (महिलाओं की भारी तादाद) को तो अपनी ओर खींच ही रहे हैं साथ ही अपने सशक्त विषयों से उन्हें सोचने को मजबूर भी करते हैं।

यहां मैं अपने ही घर का उदाहरण लेता हूं। घर की महिलाएं (मां, भाभियां) ऐसे धारावाहिकों को बड़े गौर से देखती हैं, साथ ही उनके जरिए समाज की गलत परंपराओं को कोसती भी नजर आती हैं। इन धारावाहिकों के जरिए भारत के मध्यम वर्गीय टीवी दर्शकों की मानसिकता में आज यह बड़ा परिवर्तन आया है कि अब वे सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करते बल्कि अपने परिवेश में सदियों से चले आ रहे अमानवीय और क्रूर व्यवस्था का विरोध भी करने लगे हैं। महिला उत्पीड़न, बाल विवाह, भ्रूण हत्या, जाति-उत्पीड़न जैसे विषयों पर अब उनकी स्पष्ट और जिम्मेदार राय बनने लगी है।

अभी पिछले दिनों की बात है। ‘12/24 करोलबाग’ धारावाहिक के जिस एपिसोड में टुच्चे, ऐय्याश दूल्हे राजीव भल्ला को भरी बारातियों के सामने बुरी तरह अपमानित कर सिमी के पिता और परिवार वालों ने वापस किया था, लोगों ने इसकी जमकर तारीफ की। बेटी के पिता के उसके इस साहस भरे फैसले की खूब सराहना हुई। उसी तरह ‘इस देस न आना लाडो’ की दबंग और क्रूर ‘अम्मा जी’ की करतूतों (भ्रूण-हत्या से लेकर तमाम तरह के प्रपंचों) को दर्शक पानी पी-पी कर कोसते दिखते हैं। बिहार की सामंती व्यवस्था की जघन्यता पर आधारित कहानी ‘अगले जनम मोहे बिटिया की कीजो, नारी-सशक्तीकरण की अद्भुत मिसाल है। औरत को पांव की जूती समझी जाने वाली मध्ययुगीन घृणित व्यवस्था से लाली और शेखर की मां बहादुरी से लड़ती दिखाई पड़ती हैं।

जाहिर है भारतीय समाज में घरेलू हिंसा और पुरुषवादी साजिशों-व्यवस्थाओं की शिकार औरतें इन धारावाहिकों के ऐसे पात्रों से जाने-अनजाने प्रेरित होकर अपने उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ युद्ध का बिगुल फूंकेंगी और उम्मीद करें कि हमारे समाज में एक नए और अनकहे परिवर्तन की बयार चल पड़ेगी।
सुमित सिंह,मुम्बई

2 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

शुरूआत अच्छी है, आशा है रंग लाएगी।
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अदभुत है हमारा शरीर।
अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद कैसे सफल होगा?

अंशुमाली रस्तोगी said...

आजकल के बेढप और बेमकसद सीरियल समाज में कोई बदलाव ला पाएंगे, यह कल्पना बेमानी है।