...सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना....
-अवतार सिंह संधू उर्फ़ पाश

Thursday, April 7, 2011

महात्मा ‘अन्ना’ के अनशन में हम भी साथ हैं!!


यह किसी एक व्यक्ति या किसी एक समुदाय से छुटकारा पाने का प्रयास नहीं, बल्कि इंसान के नैतिकता बोध के मर जाने के ख़िलाफ एक आंदोलन है। समाजिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार के बहते गंदे पानी की सफाई का यह एक जुनूनी और ईमानदार प्रयास है।

किसन बापट बाबूराव हजारे उर्फ अन्ना हजारे जैसे प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता ने इस आंदोलन का बीड़ा उठाया है। वे गत 5 अप्रैल को दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन पर बैठ चुके हैं। उनके इस प्रयास के समर्थन में पूरे देश में हजारों जिम्मेदार लोगों ने अपने-अपने स्थानों पर अनशन करना शुरु कर दिया है। मेधा पाटेकर, किरण बेदी समेत देश के कई सामाजिक कार्यकर्ता उनके इस पवित्र प्रयास में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। योगगुरु श्री रामदेव, सामाजिक कार्यकर्ता श्री अग्निवेश जैसी हस्तियों का उन्हें खुला समर्थन मिल रहा है।
बॉलीवुड के संजीदा और जिम्मेदार अभिनेता आमिर खान ने भी प्रधान मंत्री को पत्र लिखकर ‘अन्ना’ के लिए अपना समर्थन दिखाया है। जाने-माने निर्देशक शेखर कपूर, समाज की विसंगतियों को पर्दे पर उभारने वाले फिल्मकार मधुर भंडारकर जैसी हस्तियों ने भी ‘अन्ना’ के समर्थन में अपनी आवाज बुलंद की है। मुम्बई में तो आलम यह है कि हजारों नागरिकों के अन्ना के समर्थन में उतरने के साथ ही झुग्गियों में रहने वाले लोग भी सड़कर पर उतरकर ‘अन्ना’ के पक्ष में अपनी अवाज मजबूत कर रहे हैं। देश के दूसरे शहरों का भी कुछ यही हाल है। बेंगलूरु, चेन्नई, लखनऊ, पुणे, औरंगाबाद, नासिक जैसे शहरों में भी हजारों लोग अन्ना के इस ईमानदार प्रयास में अपना भरोसा जताने से पीछे नहीं हैं।

दरअसल यह सारी कवायद है ‘लोकपाल बिल’ को लेकर, यानि वह बिल जिसके पास हो जाने के बाद देश की ऑपरेटिंग मशीनरी से भ्रष्टाचार जैसी बड़ी समस्या पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इस कानून द्वारा लोगों की मेहनत की कमाई को गलत जगहों में अवैध रूप से खर्च करने की बजाए उसे देश में शिक्षा, रोजगार, सड़क, बिजली, स्वास्थ्य सेवा, हमारे वंचितों-बेसहारे भाइयों-बहनों के लिए एक बेहतर और आसान ज़िंदगी मुहैय्या कराई जा सकती है। हमारे देश के लिए तरक्की और खुशिहाली का सफ़र कुछ और आसान हो जाएगा।

क्या है “लोकपाल बिल”
यह बिल पहले पहल वर्ष 1969 में पेश किया गया था। तब यह लोक सभा में तो पास हो गया था पर राज्य सभा की मंजूरी इसे नहीं मिल पाई। तब से लेकर आज तक यह बिल सरकारों की बदनियती का शिकार होता संसद में यहां से वहां डोलता रहा। बाद के वर्षों में इस बिल में कई सारे सुधार और फरबदल कर वर्ष 1971 से लेकर 2008 में संसद में 9 बार पेश करने का प्रयास किया गया, पर इसे कभी मंजूरी नहीं मिल पाई।

इस बिल के पास हो जाने के बाद देश के सभी राज्यों में ‘लोकायुक्त’ और केंद्र में ‘लोकपाल’ नाम के एंटी करप्शन ऑथॉरिटी की नियुक्ति की जाएगी, जो देश की राजनीति तथा ब्युरोक्रेसी में जड़ जमाए अनैतिकता और भ्रष्टाचार पर कड़े कदम उठाएंगे। इस कानून से प्रधान मंत्री समेत अन्य मंत्रियों और सासंदों को किसी प्रकार के करप्शन के आरोप पर दबोचा जा सकता है। अच्छी बात यह कि लोकपाल को उन मामलों पर 6 महीने के भीतर अपनी जांच पूरी करनी होगी। जाहिर है इससे भ्रष्टाचार के खिलाफ मामलों को जल्द से जल्द निपटाया जा सकता है और दोषियों को समय पर उचित सजा दी जा सकेगी।

बिल पास होने में क्या अड़चने हैं?
मौजूदा सरकार ने इस बिल का जो ड्राफ्ट तैयार किया है, वह पूरी तरह से निष्पक्ष नहीं है। यानि हम संक्षिप्त में यह कह सकते हैं कि इसमें देश के बड़े नेताओं या ब्युरोक्रेट्स को करप्शन के आरोपों से बचाने की गुंजाइश रखी गई है। कॉग्रेस सरकार द्वारा बनाए इस बिल के मौजूदा प्रारूप में प्रधानमंत्री को इससे बाहर रखने की बात की गई है। अन्ना हजारे और उन जैसे सामाजिक कार्यकर्ता चाहते हैं कि यह बिल देश की अन्य स्वायत्त संस्था की तरह ही सरकारी दबाव से पूरी तरह से अगल रखा जाए, अन्यतथा यह हाथी का दांत बनकर रह जाएगा। यही है ‘अन्ना’ का विरोध।

अन्ना के सामाजिक जीवन पर एक नज़र
अन्ना का जन्म 15 जनवरी 1940 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के भिनगरी गांव में हुआ। माता-पिता मजदूर परिवार से थे...इसलिए ज़िंदगी की सच्चाइयों और कठिनाइयों को समझने में इन्हें ज्यादा वक्त नहीं लगा। आर्थिक अभाव की वजह से कक्षा पांच से आगे की पढ़ाई नहीं कर पाए पर देश की व्यवस्था में व्याप्त गंदगियों का अच्छा अध्ययन कर लिया। स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और आचार्य विनोभा भावे के दर्शन का उनके जीवन पर गहरा असर पड़ा।

भारतीय सेना में ड्राइवर की नौकरी पाई। वर्ष 1975 में जब नौकरी से स्वैच्छिक अवकाश लेकर अपने पारिवारिक गांव रालेगन सिद्धी लौटे तो गांव में लोगों की शराबखोरी और गांव की बदहाली से काफी आहत हुए। लोगों को सुधारने के बहुत जतन किए...गांव में पानी की कमी थी...लोगों का जीवन कठिन था। अन्ना ने लोगों को समझाया...उनका सहयोग लिया और छोटी-छोटी नहरों द्वारा पास की पहाड़ी से पानी लाकर सींचाई की अच्छी व्यवस्था की...अब अच्छी फ़सलें उगने लगीं...लोगों के जीवन में खुशियां आने लगीं और रालेगन सिद्धी एक आदर्श गांव बन गया, जो देश के सामने एक मिसाल था। इस प्रतिबद्ध और ईमानदार प्रयास के लिए उन्हें 1992 में पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया।

आइए महात्मा अन्ना के इस पवित्र प्रयास में हम भी एक कदम आगे बढ़ाएं और यह संकल्प लें ‘न हम भ्रष्टाचार करेंगे न ही किसी को करने की इजाजत देंगे।’

-Sumit Singh, Mumbai.