...सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना....
-अवतार सिंह संधू उर्फ़ पाश

Wednesday, October 15, 2008

आख़िरी बार रोता हुआ आदमी

पागल होने से पहले
आख़िरी बार रोते हुए आदमी को देखकर
किसी की रूह नहीं कांपती
कोई नहीं सोचता कि यह आदमी अब कभी अपने घर नहीं लौट पाएगा
कभी इसके सपनों में चिड़ियों से भरा आसमान नहीं टंकेगा
कभी वह अपनी पहचान नहीं खोल पाएगा
शहर के कुत्ते
देर तक उसे शक की निगाह से देखकर भौंकते रहेंगे...

कोई नहीं डरता उसे देखकर
कोई नहीं डरता यह सोचकर
कि पागल होते आदमी की ख़ामोशी जब शोर बनकर निगलेगी समूचे शहर को
तो हर कोई एक-दूसरे से ख़फ़ा दिखेगा...।

सुमित सिंह

6 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

seema gupta said...

कोई नहीं डरता उसे देखकर
कोई नहीं डरता यह सोचकर
कि पागल होते आदमी की ख़ामोशी जब शोर बनकर निगलेगी समूचे शहर को
तो हर कोई एक-दूसरे से ख़फ़ा दिखेगा...।
" very very emotional creation'

regards

मनुज मेहता said...

कोई नहीं डरता उसे देखकर
कोई नहीं डरता यह सोचकर
कि पागल होते आदमी की ख़ामोशी जब शोर बनकर निगलेगी समूचे शहर को
तो हर कोई एक-दूसरे से ख़फ़ा दिखेगा...।

bahut khoob sumit, bahut umda, sach mein bahut gehra arth chodti aapki baat

Parul said...

mehsuus hoti panktiyan/bhaav

आशीष said...

dil ko chune wali

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत अच्छी तहरीर है... हमारे ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया...