...सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना....
-अवतार सिंह संधू उर्फ़ पाश

Friday, October 10, 2008

शहर की एक लड़की जो किसी से प्रेम नहीं करती

सहयाद्री की पहाड़ियों की तरह
अंदर से सख्त
मगर बाहर हरेपन की एक नर्म और पतली परत लिए
है शहर की एक लड़की
वह उन लम्हों में प्रेम करने से अक्सर खुद को बचाती है
जब उसके चेहरे पर एक मासूम-सी मुस्कराहट मचल उठती है

अव्वल तो यह लड़की सूई में धागे नहीं पिरोती
और पिरोती भी है तो तब
जब अपने दिल को थोड़ा और कड़े करने की जरूरत समझती है
अपनी मासूमियत में फ़रेब छुपाने की कोशिश करती
तब वह इस काइनात की सबसे खतरनाक शै में एक होती है

वह थोड़ा कहती है....धीमे बोलती है
आचरण की सख्ती पसंद है उसे
पर मुहब्बत के नाम पर नाक सिकोड़ती है

अपनी माँ का पल्लू कब का छोड़ चुकी
कितनी बेरहम हो सकती है अंदर से
इसका अंदाज़ा नहीं होने देती
करियर..एस्पिरेशंस...एम्बिशंस...रिलिजन जैसे कई खूबसूरत औजारों से
कभी गलती से उग आई प्रेम की धार को काट डालती है

दिन भर के सूखे कपड़े उठाने आते वक्त
बाल्कनी में वह कभी सपने नहीं देखती...
उसकी आंखों में चमक होती है
पर उसे कभी किसी का इंतजार नहीं होता
सिर्फ अपने शहर की तरह जीना चाहती है
ज़िंदगी भर असंतृप्त...

धीरे-धीरे चमक खो रही है यह जवान लड़की
हर बार जो प्रेम करने से बचा ले जाती है खुद को सुरक्षित
...सचमुच रूह कंपा जाती है

यकीन मानिए मुल्क की आबादी में
लड़कियों की आबादी के अनुपात का बिगड़ना
उतना खौफ़नाक नहीं
जितना कि शहर की इस लड़की का वीरान होना पसंद करना है

डरावनी बात यह भी है
कि कविता की आने वाली पंक्तियों में यह लड़की दिखेगी तो सही
पर उसके प्रेम की कहीं कोई चर्चा नहीं होगी।

सुमित सिंह

5 comments:

तरूश्री शर्मा said...

अव्वल तो यह लड़की सूई में धागे नहीं पिरोती
और पिरोती भी है तो तब
जब अपने दिल को थोड़ा और कड़े करने की जरूरत समझती है

बढ़िया लिखा है.... अच्छे प्रतीकों से साथ बिम्ब बनाते हुए भावनाओं का बयान किया है आपने.... निर्बाध.
बधाई।

seema gupta said...

डरावनी बात यह भी है
कि कविता की आने वाली पंक्तियों में यह लड़की दिखेगी तो सही
पर उसके प्रेम की कहीं कोई चर्चा नहीं होगी।
" kmal kee abhevyktee, magar ek sach ke sath, sunder'

regards

फ़िरदौस ख़ान said...

दिन भर के सूखे कपड़े उठाने आते वक्त
बाल्कनी में वह कभी सपने नहीं देखती...
उसकी आंखों में चमक होती है
पर उसे कभी किसी का इंतजार नहीं होता सिर्फ अपने शहर की तरह जीना चाहती है
ज़िंदगी भर असंतृप्त...


अपनी हमज़ाद लगी यह लड़की...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

धीरे-धीरे चमक खो रही है यह जवान लड़की
हर बार जो प्रेम करने से बचा ले जाती है खुद को सुरक्षित
...सचमुच रूह कंपा जाती है


भाव बहुत अच्छे हैं इस रचना के ..

Archana said...

बहुत बढ़िया। अपनी कविता को हमेशा यूं ही ज़िंदा रखना। हालांकि इस कविता के सब्जेक्ट तक पहुंचने में मैं नाकाम रही, पर शब्दों और उसके भाव काफी बेहतरीन हैं। वैसे भी कविता हर किसी के वश की बात नहीं। अपनी सोच को कविता में ढाल पाने की क्षमता तो सबमें नहीं होती है न!

पूजा सिंह, दिल्ली