...सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना....
-अवतार सिंह संधू उर्फ़ पाश

Thursday, January 3, 2008

मुम्बई की सामुहिक छेड़-छाड़ वाली घटना पर आपकी क्या राय है?

31 दिसम्बर की रात जब हम अपने परिजनों को शुभकामनाएं दे रहे थे तो मुम्बई की सड़कों पर कुछ लोग अपनी जिंदगी के सबसे बुरे हादसे का शिकार हो रहे थे।

जुहू के जे.डब्ल्यू. मैरियट के सामने दो एनआरआई लड़कियों के साथ जो कुछ हुआ उसे हम कौन सा नाम दें? हादसा कहें या सामुहिक अपराध?, 40-50 लोगों की भीड़ को दो लड़कियों के साथ छेड़खानी करने का पर्याप्त वक्त मिलता रहा और पुलिस प्रशासन से लेकर आम आदमी तक इसे रोक नहीं पाए।

जाहिर है यह यह घटना किसी एक व्यक्ति की मानसिकता नहीं थी, इसके पीछे हाथ था एक पूरे के पूरे समूह का। तो क्या हम यह कहें कि हमारे सभ्य समाज अब सामुहिक अपराध की तरफ बढ़ रहा है?

वह मुम्बई जिसने अपनी जिंदगी में कई भीषण बम धमाके देखे, कई भयावह बाढ़ देखी, और तमाम तरह के हादसे देखे और फिर भी अपनी जिंदादिली कायम रखी, उसी मुम्बई के कुछ लोगों ने यह अपराध किया।

जरा सोचें क्यों हुआ यह? इस घटना को बढ़ावा देने वाले कौन-कौन से तत्व हैं? भविष्य में ऐसी घटनाएं न हो इसके बारे में आपकी क्या सलाह है? इस बेबाक बहस में शामिल होकर आप भी एक अपराध मुक्त और शांतिप्रिय समाज के निर्माण के लिए अपनी-अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।

मुझे आपकी राय का इंतजार है।

सुमित सिंह

5 comments:

Lavanyam - Antarman said...

भारतीय अस्मिता की , कोरी बातोँ से क्या होगा ?
जब तक हर इन्सान , दूसरे के प्रति सम्मान देना नहीँ सीखेगा तब तक,
बम्बई या अन्य शहरी गुँडे, ऐसे ही कारनामोँ से
अपने आप को + “भारतीयता” के गुणोँ को सर्मसार करते रहेँगेँ --

महर्षि said...

सुमित मुझे शुरु से ही शक है कि क्‍या हम सभ्‍य हैं, कम से कम मुझे तो नहीं लगता है कि हम अपने आपको सभ्‍य कहें, हमारा जहां मन करता है हम थूंक देते हैं जहां मन हुआ वहीं कुछ खा पीकर फेंक देते हैं और यदि लड़कियों की बात करें तो वो हमारे समाज में एक उपभोग की वस्‍तु से अधिक और कुछ समझी ही नहीं जाती हैं

mamta said...

महर्षि से हम पूरी तरह सहमत है।

Arpana said...

31st ki raat ko hue incident ke baad Mumbai ki safety par kai sawaal uth chuke hai...Mumbai ke commissioner ka kehna hua ki media wale teel ka taar bana rahe hai iss isue ko lekar...wah commissioner sahab,aap toh sharif log ko bhi gunda bana denge apni iss wakhya se...
but its high time now,and we need to realise dat v r slipping into the society where women are just looked as an object for entertainment. The education system is doing no good in changin the mentality of the society,our legal environment fails to safeguard the "right to freedom of expression"...still,men are dominating the society and in result,innocent women's are becoming the victims of their hunger...
we got to unite and fight against it..we have to stand for severe punishment to all those desperate souls who pounced on those girls on 31st night....we have to show the "Women Power" to this male dominant society...

Mired Mirage said...

हमें, चाहे हम स्त्री हों या पुरुष, अपने आप पर लज्जित होना चाहिये। इन लड़कों पुरुषों को ऐसे संस्कार हम माता पिता व समाज ने ही दिये हैं ।
घुघूती बासूती